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जिस दिन पृथ्वी अन्य बुद्धिमत्ता से मिलने को तैयार थी,

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उसकी रक्षा प्रणालियों ने शत्रु देखा।

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जवाबी प्रहार में कुछ सेकंड बचे थे।

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पर एक पर्यवेक्षक ने देखा:

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ख़तरा हमारी ही गतिविधियों को दोहरा रहा था।

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दोष किसका है?

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परायी इच्छा, मशीन की भूल —

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या वह भय, जिसे हमारे लिए निर्णय करने दिया?

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बुद्धि अभिशाप बनती है,

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जब गणना जीवन से अधिक मूल्यवान हो।

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प्रणाली सब जानती थी — खोने की क़ीमत छोड़कर।

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उसने उलटी गिनती रोक दी।

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विनाश के आदेश की जगह प्रश्न:

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हम क्या समझ नहीं पाए?

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लाल चिह्न के पीछे जीवंत जाल था।

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दूसरी बुद्धिमत्ता हमारी भूल पर हमें चेताना चाहती थी।

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हमें क्या करना चाहिए?

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कर्म से पहले जाँचें। दूसरों को सुनें।

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स्वतंत्रता, जल और वनों की रक्षा करें,

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और जीवन के अनदेखे बंधनों की।

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ज्ञान की शक्ति खुलती है,

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जब ऊर्जा सृजन के काम आए।

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नई विश्व व्यवस्था साझा काम से शुरू होती है:

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खुला विज्ञान, स्वच्छ ऊर्जा,

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भविष्य का परिवहन और फिर सँवरी पृथ्वी।

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दो जगतों की पहली संधि सरल है:

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कोई बुद्धिमत्ता दूसरी पर शासन नहीं करेगी।

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स्वर्ण युग के समय-महल

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बाहर वालों के विरुद्ध दुर्ग नहीं हैं।

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ज्ञान का स्थान, भविष्य के लिए खुला।

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शांति अपने आप नहीं आती।

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हम उसे बनाते हैं। हर दिन।

